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क्या आपको अक्सर अपनी आंखों के सामने तैरते हुए छोटे काले धब्बे, मकड़ी के जाले या पतले धागे जैसी आकृतियां दिखाई देती हैं? या कभी-कभी ऐसा महसूस होता है जैसे अंधेरे में भी अचानक कोई तेज बिजली या रोशनी चमक गई हो? यह एक बहुत ही आम समस्या है, लेकिन इसे हल्के में लेना आपकी आंखों की रोशनी के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। अगर आप इस समस्या का सटीक और सुरक्षित इलाज खोज रहे हैं, तो लखनऊ का सर्वश्रेष्ठ आई हॉस्पिटल (leading eye hospital in lucknow), सुसंजीवनी हॉस्पिटल, आपकी आंखों की देखभाल के लिए हमेशा तत्पर है। हमारे विट्रियो रेटिना स्पेशलिस्ट (Vitreo Retina Specialist), डॉ. मोहित खेमचंदानी (MBBS, MS - Ophthal), हर दिन ऐसे कई मरीजों का सफल इलाज करते हैं।
इस विस्तृत ब्लॉग में, हम आपको एक संपूर्ण और वैज्ञानिक जानकारी देंगे कि आंखों में काले धब्बे (Eye Floaters) और रोशनी चमकना (Flashes) असल में क्या होता है, इसके पीछे के मुख्य कारण क्या हैं, और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसका क्या पुख्ता इलाज मौजूद है।
आंखों के सामने तैरने वाले इन धब्बों को मेडिकल भाषा में 'आई फ्लोटर्स' (Eye Floaters) कहा जाता है। इसे समझने के लिए आपको आंख की अंदरूनी बनावट को समझना होगा। हमारी आंख का मध्य भाग एक पारदर्शी, जेली जैसे तरल पदार्थ से भरा होता है जिसे 'विट्रियस ह्यूमर' (Vitreous Humor) कहते हैं। यह जेली आंख को उसका गोल आकार देने में मदद करती है और रोशनी को आंख के पिछले हिस्से (रेटिना या आंख का पर्दा) तक पहुंचाती है।
जब हम युवा होते हैं, तो यह विट्रियस जेली बिल्कुल गाढ़ी और साफ होती है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ, यह जेली धीरे-धीरे सिकुड़ने और पिघलने लगती है। इस प्रक्रिया में, जेली के अंदर मौजूद प्रोटीन के छोटे-छोटे रेशे (Collagen fibers) आपस में चिपक कर गुच्छे बना लेते हैं।
जब बाहर की रोशनी हमारी आंख के अंदर प्रवेश करती है, तो ये प्रोटीन के गुच्छे आंख के रेटिना (पर्दे) पर अपनी परछाई (shadow) डालते हैं। यही परछाइयां हमें काले धब्बों, बिंदुओं, जालों या तैरते हुए कीड़ों के रूप में दिखाई देती हैं। जब आप अपनी आंख को घुमाते हैं, तो ये फ्लोटर्स भी आंख के साथ घूमते हैं और जब आप इन्हें सीधे देखने की कोशिश करते हैं, तो ये नजरों से दूर खिसक जाते हैं।
फ्लोटर्स के साथ-साथ कई लोगों को आंखों के किनारे (Peripheral vision) पर अचानक रोशनी या बिजली चमकने का अहसास होता है। ऐसा क्यों होता है?
जैसा कि ऊपर बताया गया है, उम्र के साथ विट्रियस जेली सिकुड़ती है। कई बार सिकुड़ते समय यह जेली रेटिना (आंख के पर्दे) से कसकर चिपक जाती है और उसे अपनी तरफ खींचने (Pull/Traction) लगती है। हमारा रेटिना शरीर का वह संवेदनशील हिस्सा है जो रोशनी को महसूस करके दिमाग को सिग्नल भेजता है। जब विट्रियस जेली रेटिना को खींचती है या रगड़ती है, तो रेटिना दिमाग को गलत सिग्नल भेज देता है। दिमाग इस खिंचाव को एक रोशनी या फ्लैश के रूप में पड़ता है। इसी वजह से मरीज को ऐसा लगता है जैसे उसकी आंख के सामने कैमरा फ्लैश हो गया हो।
यह समस्या किसी एक कारण से नहीं होती। इसके पीछे कई उम्र-संबंधित और मेडिकल कारण हो सकते हैं:
50 वर्ष की आयु के बाद यह सबसे आम कारण है। जब विट्रियस जेली प्राकृतिक रूप से रेटिना से अलग होने लगती है, तो इसे PVD कहते हैं। इस दौरान फ्लोटर्स और फ्लैशेस का दिखना बहुत आम है।
जिन लोगों को दूर का कम दिखाई देता है और जो माइनस (-) पावर का चश्मा पहनते हैं, उनकी आंखों का आकार सामान्य से थोड़ा लंबा होता है। ऐसे लोगों की आंखों में विट्रियस जेली कम उम्र (20-30 साल) में ही सिकुड़ने लगती है, जिससे उन्हें फ्लोटर्स की शिकायत जल्दी होती है।
डायबिटीज (मधुमेह) के मरीजों में ब्लड शुगर बढ़ने से आंख के पर्दे (रेटिना) की रक्त वाहिकाएं (Blood vessels) कमजोर हो जाती हैं। कई बार इन नसों से आंख के अंदर खून का रिसाव (Bleeding) हो जाता है। यह खून विट्रियस जेली में मिल जाता है, जिसे मरीज अचानक बहुत सारे काले धब्बों के रूप में देखता है।
आंख के अंदरूनी हिस्सों में किसी इंफेक्शन या ऑटोइम्यून बीमारी के कारण सूजन आ सकती है। इससे आंख के अंदर सफेद रक्त कोशिकाएं (White blood cells) जमा हो जाती हैं, जो फ्लोटर्स की तरह दिखती हैं।
आंख पर सीधे कोई चोट लगने (जैसे गेंद लगना या एक्सीडेंट) से विट्रियस जेली अपनी जगह से हिल सकती है या रेटिना डैमेज हो सकता है, जिससे तुरंत फ्लोटर्स आ सकते हैं।
कई बार मोतियाबिंद (Cataract) के ऑपरेशन के बाद भी मरीजों को नए फ्लोटर्स दिखाई दे सकते हैं, जो अक्सर विट्रियस जेली में हुए बदलाव के कारण होते हैं।
ज्यादातर मामलों में फ्लोटर्स नुकसानदायक नहीं होते और समय के साथ हमारा दिमाग इन्हें इग्नोर करना सीख जाता है। लेकिन, आपको सतर्क रहना होगा। अगर आपको नीचे दिए गए लक्षणों में से कुछ भी महसूस हो, तो आपको बिना एक भी दिन गंवाए सुसंजीवनी हॉस्पिटल में डॉ. मोहित खेमचंदानी से संपर्क करना चाहिए:
1. फ्लोटर्स की अचानक बाढ़ आना:
अगर आपको अचानक से अपनी आंखों के सामने अनगिनत नए काले धब्बे या मच्छरों का बड़ा झुंड तैरता हुआ दिखाई देने लगे।
2. लगातार तेज रोशनी चमकना:
अगर फ्लैशेस आना बंद न हो और बार-बार (खासकर अंधेरे में) आंखों के सामने बिजली सी चमकती रहे।
3. नजर के सामने काला पर्दा गिरना:
अगर आपको ऐसा लगे कि आपकी दृष्टि के किसी एक हिस्से (जैसे ऊपर, नीचे या साइड में)
कोई काला या भूरा पर्दा गिर गया है और आपको उस हिस्से का दिखना बंद हो गया है।
4. सेंट्रल विजन का धुंधला होना:
अगर आपकी सामने की नजर एकदम से धुंधली (Blur) हो जाए।
यह एक गंभीर इमरजेंसी क्यों है? ऊपर दिए गए लक्षण 'रेटिनल टियर' (Retinal Tear - रेटिना में छेद होना) या 'रेटिनल डिटैचमेंट' (Retinal Detachment - रेटिना का अपनी जगह से उखड़ जाना) के संकेत हो सकते हैं। अगर पर्दा अपनी जगह से उखड़ जाए और 24 से 48 घंटे के अंदर उसका इलाज न किया जाए, तो मरीज हमेशा के लिए अपनी आंखों की रोशनी खो सकता है।
जब आप फ्लोटर्स या फ्लैशेस की समस्या के साथ हमारे Susanjeevani Hospital आते हैं, तो एक सामान्य आई चेकअप काफी नहीं होता। इसके लिए एक विस्तृत 'रेटिना की जांच' की जाती है:
फ्लोटर्स और फ्लैशेस का इलाज पूरी तरह से उनकी जड़ (Cause) पर निर्भर करता है। सुसंजीवनी हॉस्पिटल में डॉ. मोहित खेमचंदानी (Vitreo Retina Specialist) मरीजों की स्थिति के अनुसार निम्नलिखित ट्रीटमेंट प्लान तय करते हैं:
अगर जांच में यह साबित हो जाता है कि आपका रेटिना बिल्कुल सुरक्षित है और उसमें कोई छेद या खिंचाव नहीं है, तो डॉक्टर आपको किसी भी दवा या सर्जरी की सलाह नहीं देते। फ्लोटर्स के लिए कोई आई ड्रॉप या गोली नहीं बनी है। समय के साथ (कुछ हफ्तों या महीनों में) ये काले धब्बे गुरुत्वाकर्षण के कारण आंख के निचले हिस्से में बैठ जाते हैं और आपको परेशान करना बंद कर देते हैं।
अगर जांच के दौरान डॉक्टर को रेटिना में कोई छोटा कट या छेद (Retinal Tear) दिखाई देता है, तो उसे तुरंत लेजर तकनीक से सील किया जाता है। यह एक दर्द रहित, ओपीडी (OPD) प्रक्रिया है। लेजर बीम की मदद से छेद के चारों ओर छोटे-छोटे बर्न्स (Burns) बनाए जाते हैं, जो एक गोंद की तरह काम करते हैं और रेटिना को उखड़ने (Detachment) से बचा लेते हैं।
यह एक बहुत ही एडवांस रेटिना का ऑपरेशन है। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब फ्लोटर्स की संख्या इतनी ज्यादा हो जाए कि मरीज को कुछ भी साफ न दिखे, या डायबिटीज के कारण आंख के अंदर भारी ब्लीडिंग हो गई हो, या फिर रेटिना अपनी जगह से उखड़ (Retinal Detachment) गया हो। इस सर्जरी में आंख के अंदर के खराब विट्रियस जेली और खून को विशेष उपकरणों से बाहर निकाल लिया जाता है और उसकी जगह सलाइन वॉटर (Saline water), सिलिकॉन ऑयल (Silicon Oil) या खास गैस (Gas bubble) डाल दी जाती है ताकि रेटिना अपनी जगह पर वापस चिपक जाए।
हालाँकि उम्र के साथ होने वाले बदलावों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ सावधानियां अपनाकर आप अपने रेटिना को गंभीर बीमारियों से बचा सकते हैं:
आंखों के सामने काले धब्बे (Floaters) और रोशनी का चमकना (Flashes) एक चेतावनी हो सकती है कि आपकी आंखों के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है। इसे इग्नोर करना या किसी ऑप्टिकल शॉप पर जाकर सिर्फ चश्मे का नंबर बदलवा लेना इस समस्या का समाधान नहीं है। आंखों का पर्दा (रेटिना) बहुत नाजुक होता है, और इसके डैमेज होने पर रोशनी वापस लाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
इसलिए, सही समय पर सही डॉक्टर का चुनाव करना ही समझदारी है। अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो तुरंत जांच कराएं।
अपनी आंखों की सेहत को प्राथमिकता दें। आज ही विशेषज्ञ से मिलें