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ज़रा सोचिए — आप रोज़ की तरह सुबह अखबार पढ़ रहे हैं, और अचानक महसूस होता है कि पन्ने के किनारे के शब्द थोड़े धुंधले से लग रहे हैं। आप इसे थकान या बढ़ती उम्र का असर मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। असल में यही वह पल होता है, जहां ज़्यादातर लोग सबसे बड़ी गलती कर बैठते हैं। ग्लूकोमा, यानी काला मोतियाबिंद, ठीक इसी तरह काम करता है — बिना शोर मचाए, बिना दर्द दिए, धीरे-धीरे आंखों की रोशनी छीनता रहता है। लखनऊ में हर साल सैकड़ों मरीज देर से इलाज के लिए पहुंचते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि शुरुआती संकेतों को सामान्य थकान समझ लिया जाता है। यही वजह है कि आंखों से जुड़ी कोई भी अनजान परेशानी महसूस होते ही किसी भरोसेमंद eye hospital से संपर्क करना समझदारी भरा कदम है। Susanjeevani Hospital में ऐसे कई मामले देखे गए हैं, जहां समय पर पहचान ने मरीज की आंखों की रोशनी पूरी तरह बचा ली।
ग्लूकोमा दरअसल एक नहीं, बल्कि आंखों की कई बीमारियों का समूह है, जो ऑप्टिक नर्व यानी आंख की उस नस को नुकसान पहुंचाती हैं जो दिमाग तक तस्वीरें पहुंचाने का काम करती है। आंख के अंदर मौजूद तरल पदार्थ का दबाव (इंट्राओक्युलर प्रेशर) जब बढ़ने लगता है, तो यही नस धीरे-धीरे कमज़ोर होती चली जाती है।
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि एक बार नस को हुआ नुकसान वापस ठीक नहीं किया जा सकता। इलाज से सिर्फ आगे की क्षति को रोका जा सकता है, पहले हुआ नुकसान वापस नहीं आता। इसीलिए शुरुआती पहचान इतनी ज़रूरी हो जाती है।
ज़्यादातर बीमारियां दर्द या तकलीफ के ज़रिए अपनी मौजूदगी का एहसास करा देती हैं। ग्लूकोमा ऐसा नहीं करता। खासकर ओपन-एंगल ग्लूकोमा, जो इसका सबसे आम प्रकार है, सालों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के आंखों में पनपता रहता है। मरीज को तब तक कुछ महसूस नहीं होता, जब तक दृष्टि का काफी हिस्सा प्रभावित नहीं हो जाता। यही कारण है कि नियमित आंखों की जांच को नज़रअंदाज़ करना खतरे को बढ़ा देता है।
कुछ संकेत बहुत हल्के होते हैं और आसानी से नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। नीचे दिए गए लक्षणों को पहचानना सीखें — यही आपकी रोशनी बचाने की पहली सीढ़ी है।
यह सबसे आम और सबसे चालाक लक्षण है। शुरुआत में सीधे सामने की चीज़ें साफ दिखती रहती हैं, लेकिन बगल की चीज़ें पकड़ने में दिक्कत होने लगती है। बहुत से लोग इसे सिर्फ "ध्यान न देना" समझकर टाल देते हैं।
रात में गाड़ी चलाते समय हेडलाइट्स या स्ट्रीट लाइट के चारों ओर रंगीन घेरे या हेलो दिखाई देना, आंख के अंदर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है। इसे अक्सर लोग सिर्फ चश्मे के नंबर की गड़बड़ी मानकर छोड़ देते हैं।
कई मरीज बताते हैं कि उन्हें आंखों के पीछे एक अजीब-सा भारीपन या हल्का दबाव महसूस होता है, जैसे आंखें थकी हुई हों। यह अहसास आता-जाता रहता है, इसलिए लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते।
खासकर शाम के समय या स्क्रीन पर ज़्यादा देर काम करने के बाद होने वाला सिरदर्द, कई बार आंखों के दबाव से जुड़ा हो सकता है। अगर सामान्य दवाओं से भी आराम नहीं मिलता, तो आंखों की जांच ज़रूर करवाएं।
अगर शाम ढलते ही या कम रोशनी वाली जगह पर देखना मुश्किल लगने लगे, तो यह आंखों की अनुकूलन क्षमता में आई कमी का संकेत हो सकता है। यह लक्षण अक्सर धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए शुरुआत में पकड़ में नहीं आता।
एक्यूट एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा में लक्षण अचानक और गंभीर रूप से सामने आते हैं:
अगर इनमें से कोई भी लक्षण दिखे, तो देर बिल्कुल न करें। यह स्थिति घंटों में स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है, इसलिए तुरंत नज़दीकी नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें।
हर किसी को ग्लूकोमा का खतरा बराबर नहीं होता। नीचे दिए गए कारक जोखिम बढ़ा देते हैं:
अगर इनमें से एक भी बात आप पर लागू होती है, तो साल में कम से कम एक बार आंखों की पूरी जांच करवाना बेहद ज़रूरी है।
ग्लूकोमा की सबसे डरावनी बात यही है कि नुकसान चुपचाप होता रहता है। शुरुआत में सिर्फ साइड विज़न प्रभावित होती है, इसलिए रोज़मर्रा के काम सामान्य ही लगते रहते हैं। समय के साथ यह दायरा सिकुड़ता जाता है, और एक स्थिति ऐसी आ जाती है जहां सीधे सामने की चीज़ें भी धुंधली दिखने लगती हैं। बिना इलाज के यह स्थायी अंधेपन तक पहुंच सकती है — और यह नुकसान वापस नहीं किया जा सकता।
ग्लूकोमा की पहचान सिर्फ नंबर के चश्मे की जांच से नहीं हो सकती। इसके लिए आंख के अंदर के दबाव, ऑप्टिक नर्व की स्थिति और दृष्टि के दायरे की विशेष जांच ज़रूरी होती है। Susanjeevani Hospital में अनुभवी नेत्र विशेषज्ञों की मदद से यह जांच आसानी से और सही समय पर की जाती है, ताकि किसी भी शुरुआती बदलाव को नज़रअंदाज़ होने से रोका जा सके।
अगर आपको ऊपर बताए गए लक्षणों में से कोई भी महसूस हो, या आप जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं, तो जांच टालना सही फैसला नहीं है। समय पर पहचान ही आंखों की रोशनी बचाने का सबसे भरोसेमंद तरीका है।
ग्लूकोमा धीरे-धीरे, बिना चेतावनी दिए आंखों की रोशनी छीनता है, इसलिए इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना ही सबसे बड़ा बचाव है। साइड विज़न में कमी, रोशनी के घेरे, आंखों में भारीपन या बार-बार सिरदर्द — इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो उसे टालें नहीं। समय पर जांच करवाकर न सिर्फ आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है, बल्कि भविष्य में होने वाली बड़ी परेशानियों से भी बचा जा सकता है। अपनी आंखों की सेहत को प्राथमिकता दें और जल्द से जल्द विशेषज्ञ से जांच करवाएं।